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बुधवार, 11 मार्च 2009

कब तक?

एक ख़बर के अनुसारहिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले के मडिकल कॉलेज के छात्र अमन की रैगिंग ने जान ले ली .ये ख़बर हमें कई चीज़ें सोचने पर मजबूर करती है। पहली और सबसे बड़ी चौंकाने वाली बात ये है की ये घटना सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के कुछ रोज़ बाद आया है जो उसने राग्गैंग पर रोक लगाने के लिए दिया था.दूसरी बात ये है की उस बच्चे के शिकायत करने पर भी कॉलेज के प्रशासन ने कुछ नहीं किया.क्यों? इससे ना केवल ये पता चलता है कि अक्सर कॉलेज प्रशासन नए छात्रों के साथ हो रहे व्यवहार और कैम्पस में उनके अनुभवों को लेकर संवेदनहीन होता है ,साथ ही ये भी पता चला कि इन्हें कोर्ट के फैसलों कि कोई परवाह नहीं है.जब प्रशासन ही परवाह नहीं करता तो बच्चों से कोई कैसे और क्या उम्मीद करेगा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था ki अगर कोई रैगिंग करेगा तो उसे हॉस्टल से निकाल दिया जायेगा । एक समिति उसपर फ़ैसला लेगी और दोषी पाये जाने पर उसे कॉलेज से भी निकाल दिया जायेगा।
इस घटना ने ये साबित कर दिया की न तो कोर्ट के फैसले का कोई महत्व है और न ही रैगिंग रोकने के लिए बने कानूनों का । सीनियर विद्यार्थियों के साथ मेलजोल बढ़ाने औएउत्साह बढ़ाने के नाम पर की जा रही ये रैगिंग किस तरहां एक बच्चे के मानसिक और शारीरिक शोषण का कारण बन सकती है, ये इस घटना से साफ़ झलकता है। इट किल्स यौर इमोशंस.....इट किल्स यौर सेल्फ- एस्टीम...अमन की डायरी में लिखे ये शब्द साफ़ बताते हैं की उसके साथ की जा रही ज्यादती उस पर एक दबाव बना रही थी। अपनी कॉलेज लाइफ के प्रति उत्साह के साथ बच्चे एक नई उमंग लेकर कॉलेज में पढने आते हैं लेकिन ऐसी घटनाएं न केवल उनकी पढ़ाई में समस्या लाती हैं बल्कि उन्हें कोलेज के वातावरण से भी एक चिढ मचनी शुरू हो जाती है.ऐसी खबरें सुनकर औएर देखकर कई माता -पिटा अपने बच्चों को घर से बाहर पढने के लिए भेजने से कतराते हैं .जिन विद्यार्थियों के साथ ऐसी घटनाएं हो जाती हैं वो या तो बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं या फिर इसका शिकार हो जाते हैं जैसे अमन हुआ.पर एक बड़ा सवाल ये uthta है की रैगिंग के असर के जिस चार्ट को अमन ने बना दिया, वो सभी प्रभाव कॉलेज में बनी बाल कल्याण समित्यियाँ,अनुशासन समितियां, ऐसे केस लड़ने वाले हजारों लोग और ख़ुद कॉलेज प्रशासन आज तक क्यूँ नहीं समझ पाये? क्यूँ हम हमेशा तभी किसी बात को जान पाते हैं जब वो नुक्सान कर चुकी होती है?
एक ट्रेंड के नाम पर चली आ रही ये रैगिंग की परम्परा हमारे दिमागों में घुसी हुई है। अगर हमारे साथ इसक कुक्फ्ह हमारे सीनियर विद्यार्थियों ने किया हो तो हम भी अपने जूनियर के साथ ऐसा ही करेंगे.और इस तरहां ये परम्परा कभी रूकती ही नहीं है । नए विद्यार्थियों को कभी कोई प्रोजेक्ट करने को दे दिया जाता है जो उनकी क्षमता से बाहर हो तो कभी उनसे उलटी- सीधी हरकतें करवाई जाती हैं । आख़िर रैगिंग के लिए बने कानूनों के बावजूद ऐसा ही कैसे जाता है? शायद इन कानूनों की धज्जियाँ उडाने की एक आदत सी हो गई है ,तभी कोई लड़का इतना दब अंग हो सकता है कली कैम्पस में किसी दूसरे विद्यार्थी को मार दे।
ऐसा नहीं है की इस समस्या को रोका नहीं जा सकता। आख़िर ये समस्या हम-आप जैसे युवाओं की ही तो है। अगर हम सभी लोग ये ठान लें की अपने जूनियर के साथ ऐसा नहीं करेंगे तो ये रैगिंग अभी और यहीं ख़तम हो सकती है.माता -पिता को चाहिए किअगर उनके बच्चे के साथ ऐसा कुछ होता है तो वो ख़ुद जाकर कॉलेज में शिकायत करें और अगर इससे भी बात नहीं बने तो वो पुलिस में जा सकते हैं। कुछ गतिविधियाँ ऐसी होती हैं जिनके लिए सिर्फ़ क़ानून बना देना हबी काफ़ी नहीं होता, उसे सख्ती से लागू करना और उस समस्या से निजात पाने के लिए ख़ुद कोशिश करना भी ज़रूरी होता है.रैगिंग भी एक ऐसी ही समस्या है। फिलहाल इस घटना से एक उम्मीद जगी है की शायद रैगिंग थोडी कम हो जाए लेकिन इसे पूरी तरहां ख़तम करने के लिए लगातार ऐसी कोशिशों की ज़रूरत है जैसी अमन के पिता ने शुरू की है.



शुक्रवार, 23 जनवरी 2009


बुराडी के एक स्कूल में चौथी कक्षा के छात्र नीतिश को उसके शिक्षक ने बाल से पकड़ ब्लाक्बोर्ड पर सिर मार दिया। घर लौटने पर उसके नाक और मुह से खून बहता देख जब उसके पिता ने पुछा तो उसने बताया की वो गिर गया था .तीन दिन बाद उसके दोस्तों से असलियत पता चली .इसके बाद लोगों ने स्कूल पर हंगामा किया। पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया , जांच चल रही है। नई दुनिया में २३ जनवरी २००९ को छपी ये ख़बर कई सवाल उठाती है .सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या किसी शिक्षक द्बारा इस तरह की सज़ा देना ठीक है ? अगर किसी बच्चे ने कितनी भी शैतानी कि हो या बिल्कुल भी ना पढता हो, तो भी ये कौन सा तरीका हुआ? सवाल ये भी है कि स्कूल में बच्चे के ना पढने पर उसे सुधारना शिक्षक का कर्तव्य है,लेकिन इस तरह से क्या कोई बच्चा सुधर सकता है ?आप उसकी शैतानी और निकम्मेपन को मारना चाहते हैं, फिर उसे मारने का क्या मतलब है?
और अगर गौर किया जाए तो ये बात भी सामने आती है कि उस बच्चे के मन में स्कूल और शिक्षक का कितना खौफ होगा जो उसने घर पर झूठ बोला! तीन दिन तक वो ये बात और लगी चोट का दर्द सहता रहा । ऐसी क्या गलती कि थी उस बच्चे ने जो उसे ये सज़ा दी गई?इस घटना ने एक बार फिर इस बहस को हवा दे दी है कि क्या स्कूलों में इस तरह कि सज़ा देने कि अनुमति होनी चाहिए? ये अपनी तरह का कोई पहला किस्सा नहीं है। एक बार इसी तरह एक बच्चे को मार मार कर उसकी ह्त्या हो गई थी। इसी तरह हरयाणा में एक शिक्षक ने ऐसे बच्चे को लगातार कई किलोमीटर दौडाया जिसे अस्थमा कि बीमारी थी। सवाल ये है कि अगर उसे ये बीमारी नहीं भी होती तो भी यूँ उसे दौडाने का क्या मतलब है ? वो भी सिर्फ़ इसलिए कि उसने होमवर्क नहीं किया था.उस बच्चे को बाद में हस्पताल में भर्ती कराया गया था ।
बच्चे का दूसरा घर कहे जाने वाले स्कूलों में उनके साथ ऐसा व्यवहार करना क्या उन्हें उनके घर से दूर एक और घर देने जैसा है? क्या ऐसा करने से वो पढने लग जायेंगे? और भी बड़ा सवाल ये है कि आख़िर हमारे क़ानून में इसके लिए कोई सज़ा क्यों नहीं लिखी गई है? और अगर है भी , तो फिर बार बार ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं? क्या सभी माता पिता ऐसी सजाओं के ख़िलाफ़ कोई एक्शन नहीं उठा सकते? क्या इसी तरह ये स्कूल बच्चों के लिए कसाईखाना बने रहेंगे या फिर उनके कोमल मन और कोमल समझ के लिए हमारे पास कोई अच्छी शिक्षा व्यवस्था है? इस बारे में सोचना बहुत ज़रूरी है और अगर इस दिशा में कुछ नहीं किया गया तो आगे चलकर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हो सकती हैं जब बच्चे स्कूल जाने से घबराने लगेंगे और ऐसे में उन्हें क्या और कितना समझ में आएगा , इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। कोई हमारी सरकार से पूछे कि बच्चों के लिए स्कूलों में प्ले वे तरीका अपनाने पर इतना ज़ोर दिया जाता है लेकिन वहाँ सिस्टम का ये हाल है! ऐसे में आप क्या सोचकर बच्चों को सुविधाएं देने के नाम पर इतनी इतनी फीसें लेते हैं ? क्या माता पिता अपने बच्चे को पिटवाने के लिए स्कूल भेजते हैं। अगर आज इस पर कुछ नहीं किया गया तो शायद हमें भविष्य में अपने बच्चों के लिए पछताना पड़े!

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009


afgaanistaan में एक सड़क ऐसी है जिस पर महिलाएं नहीं जा सकती.वहाँ के एक पुराने आर्मी अधिकारी का ये कहना है की इस सड़क पर महिलाओं का चलना इस्लाम के ख़िलाफ़ है."नई दुनिया "अखबार में छपी इस ख़बर में ये बताया गया है कि वो सड़क हॉस्पिटल , मस्जिद तक जाने का रास्ता है। सोचने कि बात ये है कि उन महिलाओं को कितनी मुश्किल होती होगी जो उस मुल्लाह बने अफसर कि बात मानने को मजबूर हो जाती हैं.ख़बर में आगे बताया गया है कि वो अफसर लाठी लेकर सड़क पर घूमता है। आख़िर ऐसा क्यों है कि आदमी का वहाँ जाने कुछ ग़लत नहीं है लेकिन औरत का वहाँ जाना ठीक नहीं माना जाता?क्या किसी धर्म में ऐसा भी हो सकता है? इन मुल्लाओं द्बारा बिना तर्क और बिना किसी कारण के रोक लगाने का ये कोई पहला किस्सा सामने नहीं आया है.आख़िर कब तक पुराने ज़माने से चली आ रही इन बेबुनियाद बातों को माना जाता रहेगा? किसी समाज में इस तरह की चीज़ें जहाँ एक और उस समाज में रूढ़िवाद को बढ़ावा देती हैं वहीं उस समाज को सौ साल पीछे ले जाती हैं.आख़िर इन मुल्लाओं को किसने ये फ़ैसला करने का अधिकार दिया है कि किसी सड़क पर कौन जाएगा और कौन नहीं?सदियों से इस समाज में महिलाओं के साथ अत्याचार होते आ रहे हैं। कभी एक बच्ची कि शादी बुद्धे से कर दी जातियो है तो कभी इन्हें बेकार कि रूढियों में बाँध दिया जाता है.अपनी कट्टर विचारधारा पर चलने वाले ये मुल्ला आख़िर कब तक इसी तरहां औरतों और लड़कियों को बांधते रहेंगे?आख़िर क्यों उस समाज में एक महिला भी उसी तरह खुलकर नहीं जी सकती जैसे ये पुरूष जीते हैं?क्या कोई धर्म ये कह सकता है कि सारे नियम चलाने का हक केवल पुरुषों को है और साड़ी यातनाएं सहने के हिस्से में ?

आप सभी के इस विषय पर विचार आमंतरित हैं............