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सोमवार, 22 दिसंबर 2008

"किड्नाप" देख किया अपहरण

जब भी मीडिया की बात आती है तो अक्सर उसके लोगों,खासकर बच्चों पर पड़ने वाल्व प्रभावों की बहुत चर्चा होती है.और जब इस चर्चा की कड़ी में फिल्मों का नाम आता है तो चर्चा कुछ ज्यादा ही गर्म हो जाती है.हाल ही में करनाल में एक ऐसा haadsa हुआ जिसने बच्चों पर फिल्मों के ग़लत प्रभाव को साबित कर दिया .करनाल(हरयाणा)के कॉन्वेंट स्कूल में १०वी कक्षा के रजत ने किड्नाप फ़िल्म देखने के बाद अपने सहपाठी के छोटे भाई पूर्व,जो चौथी कक्षा में पढता था , को किड्नाप कर लिया। उसने घटना से पाँच दिन पहले ही ये फ़िल्म देखी थी.उस दिन सुबह ९ से १२ बजे तक परीक्षा देने के बाद खेल के मैदान में गया जहाँ पूर्व खेल रहा था। वो उसे ऑडिटोरियम में ले गया और बाथरूम में ले जाकर उसके हाथ-पैर बाँध दिए.बाहर से दरवाजा बंद करके उसने सामने वाले बूथ से उसके घर फ़ोन करके ३० लाख रुपए की मांग की।

उसका कहना है कि घर पर चल रहे निर्माण कार्य में अपने पिटा कि मदद करने के लिए उसे किड्नाप फ़िल्म देखकर ये आईडिया आया.फिलहाल पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है और स्कूल - प्राशासन उसे सस्पेंड करने के बाद उसके केस पर विचार विमर्श कर रहा है. क्या आपको नहीं lagtaa कि ऐसी फिल्मों पर pratibandh लगाना चाहिए?क्या hamaara sensor board इस फ़िल्म को पास करने के वक्त ये बात नहीं सोच पाया के इसका बच्चों पर ऐसा असर भी हो सकता है ?अगर इस बारे में समय से pataa न चलता तो क्या उस बच्चे को और nuksaan नहीं हो सकता था?इन फिल्मों में जिस tarhaa से aadhunik technique का istemaal करके नए -नए तरीके से apraadh किए जाते हैं,आपको नहीं लगता के इसका न केवल बच्चों पर बल्कि युवाओं पर भी ग़लत असर होता है.badlaa लेने कि bhaavna,जल्दी ameer bankar saari duniya को जीतने कि ichcha-आपको नहीं लगता कि ये sapne इन बच्चों को asli duniya से dooerrt ले जाते हैं?आप सभी के विचार आमंत्रित हैं.

रविवार, 21 दिसंबर 2008

ग़लत शुरुआत

कई बार आपके साथ कुछ ऐसी घटनाएं हो जाती हैं जिनसे आप सीधे सीधे न जुड़े होकर भी ख़ुद को उनसे जुदा हुआ महसूस करते हो.उस दिन मैं बठिंडा-दिल्ली एक्सप्रेस से करनाल से दिल्ली जा रही थी.साथ वाली सीट पर एक सरदारजी अपने परिवार के साथ आलू पूरी का लुत्फ़ उठा रहे थे.सोनीपत स्टेशन से कुछ मज़दूर जैसे लग रहे आदमी ट्रेन में चढ़े.ओपन होने के कारण डिब्बे की सभी सीटें भरी थी .तो वे लोग खड़े हो गए.उनमें एक छोटा,करीब११-१२ साल का बच्चा था जो हाथ में एक भारी बोतल लेकर खडा था.थोडी देर बाद उसने वो पानी वाली बोतल फर्श पे रख दी। गाड़ी दुसरे स्टेशन पर रुकी तो कुछ hhऔर लोग चढ़े.उन्हें जाने के लिए रास्ता मिल जाए,इसके लिए वहीँ बैठे एक भाई साहब ने उस लड़के से बोतल उठाने के लिए कहा। उसने बोतल हाथ में उठा ली। जब गाड़ी चल पड़ी तो उसने बोतल फिर फर्श पर रख दी.ऐसा नहीं था के वहाँ से गुजरने की जगह नहीं थी,क्योंकि उसने बोतल साइड में राखी थी। जब वहाँ से कुछ लोग निकल कर जा रहे थे तो फिर उन भाई साहब ने उस बच्चे को बोतल उठाने के लिए ज़ोर से कहा और उसने वो बोतल उठा ली.जब लोग वहाँ से जा चुके थे ,तो जैसे ही उसने बोतल साइड पर राखी,उन भाई साहब ने ज़ोर से उसके मुह पर एक तमाचा जड़ दिया.तमाचा इतनी ज़ोर का था के सभी का ध्यान एकाएक उस तरफ़ गया .मैं उस बच्चे के बायीं तरफ़ वाली सीट पर बैठी थी और वो भाईसाहब बिल्कुल मेरे सामने बैठे थे। तभी वो बच्चा एकदम गुमसुम सा खडा हो गया और ५ सेकंड तक वो वैसे ही खडा रहा.उसका मोह लाल हो गया था.उसके समूह के लोगों की और से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई ,शायद इसलिए के वो लोग दरवाज़े के पास बाहर की और मोह करके एक झुंड में खड़े हुए थे। तभी पीछे वाली सीट पर बैठे एक भाईसाहब उठ कर आए और उन महाशय से शांत हो जाने को कहा.उसके बाद सभी लोग अपने अपने काम में व्यस्त हो गए और उस बच्चे ने चुपचाप वो बोतल हाथ में उठा ली.मैं चुपचाप ये सारा किस्सा होते हुए देख रही थी.उसके बाद वो बच्चा करीब ५ मिनट तक खिड़की से बाहर देखता रहा.एकाएक उसकी आँख में आंसू आ गए लेकिन एक बूँद आंसू आँख से निकलते ही उसने फ़टाफ़ट से पोंछ दिया.अगले लगभग ५-६ मिनट तक वो आंसू न गिरने देने की कोशिश करता रहा,.शायद वो जानता था के उसके आंसू देखने वाला,पोंछने वाला कोई नहीं था........